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mahabharat 3.46.47: हे वरवर्णिनी! मैं आपके चरणों पर सिर रखकर आपकी शरण में आया हूँ। आप लौट जाएँ। मेरी दृष्टि में आप माता के समान पूजनीय हैं और मुझे पुत्र के समान मानकर मेरी रक्षा करें॥47॥   |   mahabharat अध्याय 3.46: उर्वशीका कामपीड़ित होकर अर्जुनके पास जाना और उनके अस्वीकार करनेपर उन्हें शाप देकर लौट आना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 46: उर्वशीका कामपीड़ित होकर अर्जुनके पास जाना और उनके अस्वीकार करनेपर उन्हें शाप देकर लौट आना  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  3.46.47 
गच्छ मूर्ध्ना प्रपन्नोऽस्मि पादौ ते वरवर्णिनि।
त्वं हि मे मातृवत् पूज्या रक्ष्योऽहं पुत्रवत् त्वया॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
हे वरवर्णिनी! मैं आपके चरणों पर सिर रखकर आपकी शरण में आया हूँ। आप लौट जाएँ। मेरी दृष्टि में आप माता के समान पूजनीय हैं और मुझे पुत्र के समान मानकर मेरी रक्षा करें॥47॥
 
O Varavarnini! I have come to you seeking refuge by placing my head at your feet. You should return. In my eyes, you are worthy of worship like a mother and you should protect me by treating me like a son. ॥ 47॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)