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mahabharat 3.46.17-18: हे नरश्रेष्ठ, जनमेजय! वह महल के द्वार पर रुकी। उस समय द्वारपालों ने अर्जुन को उसके आगमन की सूचना दी। तब सुन्दर नेत्रों वाली उर्वशी रात्रि के समय अर्जुन के अत्यंत सुंदर एवं तेजस्वी महल में प्रकट हुई। हे राजन! अर्जुन संशयग्रस्त मन से उसके पास गया। 17-18।   |   mahabharat अध्याय 3.46: उर्वशीका कामपीड़ित होकर अर्जुनके पास जाना और उनके अस्वीकार करनेपर उन्हें शाप देकर लौट आना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 46: उर्वशीका कामपीड़ित होकर अर्जुनके पास जाना और उनके अस्वीकार करनेपर उन्हें शाप देकर लौट आना  »  श्लोक 17-18
 
 
श्लोक  3.46.17-18 
तत्र द्वारमनुप्राप्ता द्वारस्थैश्च निवेदिता।
अर्जुनस्य नरश्रेष्ठ उर्वशी शुभलोचना॥ १७॥
उपातिष्ठत तद् वेश्म निर्मलं सुमनोहरम्।
सशङ्कितमना राजन् प्रत्युद्‍गच्छत तां निशि॥ १८॥
 
 
अनुवाद
हे नरश्रेष्ठ, जनमेजय! वह महल के द्वार पर रुकी। उस समय द्वारपालों ने अर्जुन को उसके आगमन की सूचना दी। तब सुन्दर नेत्रों वाली उर्वशी रात्रि के समय अर्जुन के अत्यंत सुंदर एवं तेजस्वी महल में प्रकट हुई। हे राजन! अर्जुन संशयग्रस्त मन से उसके पास गया। 17-18।
 
O best of men, Janamejaya! She stopped at the palace gate. At that time the gatekeepers informed Arjuna about her arrival. Then Urvashi with beautiful eyes appeared in Arjuna's very beautiful and bright palace at night. O King! Arjuna went to her with a doubtful heart. 17-18.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)