श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 42: अर्जुनका हिमालयसे विदा होकर मातलिके साथ स्वर्गलोकको प्रस्थान  »  श्लोक 27-28h
 
 
श्लोक  3.42.27-28h 
शिशुर्यथा पितुरङ्के सुसुखं वर्तते नग॥ २७॥
तथा तवाङ्के ललितं शैलराज मया प्रभो।
 
 
अनुवाद
'हे नागराज! जैसे बालक अपने पिता की गोद में सुखपूर्वक रहता है, वैसे ही मैं भी आपकी गोद में सुखपूर्वक खेला हूँ।'
 
'Lord Nagaraj! Just like a child lives happily in his father's lap, similarly I too have played happily in your lap. 27 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)