|
| |
| |
श्लोक 3.42.26-27h  |
फलानि च सुगन्धीनि भक्षितानि ततस्तत:।
सुसुगन्धाश्च वार्योघास्त्वच्छरीरविनि:सृता:॥ २६॥
अमृतास्वादनीया मे पीता: प्रस्रवणोदका:। |
| |
| |
| अनुवाद |
| 'मैंने यहाँ अनेक स्थानों के सुगन्धित फल खाए हैं। मैंने आपके शरीर से निकले हुए प्रचुर एवं अत्यन्त सुगन्धित जल का पान किया है। मैंने प्रतिदिन आपके झरने का अमृततुल्य सुस्वादु जल पिया है।॥26 1/2॥ |
| |
| ‘I have eaten fragrant fruits from various places here. I have consumed the abundant and extremely fragrant water that has emerged from your body. I have drunk the nectar-like delicious water of your spring every day.॥ 26 1/2॥ |
| ✨ ai-generated |
| |
|