श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 42: अर्जुनका हिमालयसे विदा होकर मातलिके साथ स्वर्गलोकको प्रस्थान  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.42.17 
नातप्ततपसा शक्य एष दिव्यो महारथ:।
द्रष्टुं वाप्यथवा स्प्रष्टुमारोढुं कुत एव च॥ १७॥
 
 
अनुवाद
जिन्होंने तपस्या नहीं की है, वे इस महान दिव्य रथ को देख या छू भी नहीं सकते, इस पर सवारी करना तो दूर की बात है॥17॥
 
Those who have not performed austerities cannot even see or touch this great celestial chariot, let alone ride on it.॥17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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