श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 38: अर्जुनकी उग्र तपस्या और उसके विषयमें ऋषियोंका भगवान् शंकरके साथ वार्तालाप  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.38.2 
यथा च पुरुषव्याघ्रो दीर्घबाहुर्धनंजय:।
वनं प्रविष्टस्तेजस्वी निर्मनुष्यमभीतवत्॥ २॥
 
 
अनुवाद
महाबाहु नरसिंह धनंजय उस निर्जन वन में बिना किसी भय के कैसे चले गये?
 
How did the mighty-armed man-lion Dhananjaya go into that deserted forest without any fear?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)