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श्री महाभारत
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पर्व 3: वन पर्व
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अध्याय 37: अर्जुनका सब भाई आदिसे मिलकर इन्द्रकील पर्वतपर जाना एवं इन्द्रका दर्शन करना
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श्लोक 50
श्लोक
3.37.50
एवमुक्त: सहस्राक्षं प्रत्युवाच धनंजय:।
प्राञ्जलि: प्रणतो भूत्वा शूर: कुरुकुलोद्वह:॥ ५०॥
अनुवाद
यह सुनकर कुरुवंश के रत्न वीर योद्धा अर्जुन ने हाथ जोड़कर सहस्त्र नेत्रों वाले इन्द्र को प्रणाम करके कहा-॥50॥
On hearing this, the brave warrior Arjuna, the jewel of the Kuru clan, folded his hands and saluted the thousand-eyed Indra and said -॥ 50॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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