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mahabharat 3.34.15: कौरव-सभा में मुनियों के समक्ष ऐसी संधि या प्रतिज्ञा करके, राज्य के हित में उसे कौन तोड़ेगा? धर्म का उल्लंघन करके पृथ्वी पर राज्य करना सज्जन पुरुष के लिए मृत्यु से भी अधिक दुःखदायी है - ऐसा मेरा मत है।   |   mahabharat अध्याय 3.34: धर्म और नीतिकी बात कहते हुए युधिष्ठिरकी अपनी प्रतिज्ञाके पालनरूप धर्मपर ही डटे रहनेकी घोषणा   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 34: धर्म और नीतिकी बात कहते हुए युधिष्ठिरकी अपनी प्रतिज्ञाके पालनरूप धर्मपर ही डटे रहनेकी घोषणा  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.34.15 
तं संधिमास्थाय सतां सकाशे
को नाम जह्यादिह राज्यहेतो:।
आर्यस्य मन्ये मरणाद् गरीयो
यद्धर्ममुत्क्रम्य महीं प्रशासेत्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
कौरव-सभा में मुनियों के समक्ष ऐसी संधि या प्रतिज्ञा करके, राज्य के हित में उसे कौन तोड़ेगा? धर्म का उल्लंघन करके पृथ्वी पर राज्य करना सज्जन पुरुष के लिए मृत्यु से भी अधिक दुःखदायी है - ऐसा मेरा मत है।
 
Having made such a treaty or pledge in the presence of saints in the Kaurava assembly, who will break it for the sake of the kingdom? To rule the earth by violating Dharma is more painful than death for a noble man - this is my opinion.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)