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mahabharat 3.34.14: दूसरी ओर, दुर्योधन शांति की इच्छा करने के स्थान पर और भी अधिक क्रोधित हो गया है। उसने हमें संकट में डाल दिया है और अन्य समस्त कौरवों को, जो उसके प्रभाव में थे और उसका अनुसरण करते रहे थे, ऊँचे पदों (देश के शासक और दुर्गरक्षक आदि) पर बिठा दिया है। ॥14॥   |   mahabharat अध्याय 3.34: धर्म और नीतिकी बात कहते हुए युधिष्ठिरकी अपनी प्रतिज्ञाके पालनरूप धर्मपर ही डटे रहनेकी घोषणा   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 34: धर्म और नीतिकी बात कहते हुए युधिष्ठिरकी अपनी प्रतिज्ञाके पालनरूप धर्मपर ही डटे रहनेकी घोषणा  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.34.14 
सुयोधनश्चापि न शान्तिमिच्छन्
भूय: स मन्योर्वशमन्वगच्छत्।
उद्योजयामास कुरूंश्च सर्वान्
ये चास्य केचिद् वशमन्वगच्छन्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
दूसरी ओर, दुर्योधन शांति की इच्छा करने के स्थान पर और भी अधिक क्रोधित हो गया है। उसने हमें संकट में डाल दिया है और अन्य समस्त कौरवों को, जो उसके प्रभाव में थे और उसका अनुसरण करते रहे थे, ऊँचे पदों (देश के शासक और दुर्गरक्षक आदि) पर बिठा दिया है। ॥14॥
 
On the other hand, instead of wishing for peace, Duryodhan has become more angry. He has put us in trouble and has elevated all the other Kauravas, who have been under his influence and have been following him, to high positions (rulers of the country and fort guards etc.). ॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)