Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 3.33.68: विद्वान् पुरुष अपने मित्रों के द्वारा अपने और अपने मित्रों में मित्र-सम्पन्न शत्रु को बाँट देता है, फिर जब मित्र विवेक के कारण उसे त्याग देते हैं, तब वह उस दुर्बल शत्रु को अपने वश में कर लेता है॥ 68॥   |   mahabharat अध्याय 3.33: भीमसेनका पुरुषार्थकी प्रशंसा करना और युधिष्ठिरको उत्तेजित करते हुए क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्ध छेड़नेका अनुरोध   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 33: भीमसेनका पुरुषार्थकी प्रशंसा करना और युधिष्ठिरको उत्तेजित करते हुए क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्ध छेड़नेका अनुरोध  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक  3.33.68 
अमित्रं मित्रसम्पन्नं मित्रैर्भिन्दन्ति पण्डिता:।
भिन्नैर्मित्रै: परित्यक्तं दुर्बलं कुर्वते वशम्॥ ६८॥
 
 
अनुवाद
विद्वान् पुरुष अपने मित्रों के द्वारा अपने और अपने मित्रों में मित्र-सम्पन्न शत्रु को बाँट देता है, फिर जब मित्र विवेक के कारण उसे त्याग देते हैं, तब वह उस दुर्बल शत्रु को अपने वश में कर लेता है॥ 68॥
 
'A learned man, by means of his friends, divides an enemy who is blessed with friends among himself and his friends. Then, when the friends abandon him due to discrimination, he brings that weak enemy under his control.॥ 68॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)