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mahabharat 3.33.64: आत्मबल ही धन का मूल है, जो कुछ इसके विपरीत है वह मिथ्या है; क्योंकि शीतकाल में वृक्षों की छाया के समान आत्मा की वह दुर्बलता व्यर्थ है ॥ 64॥   |   mahabharat अध्याय 3.33: भीमसेनका पुरुषार्थकी प्रशंसा करना और युधिष्ठिरको उत्तेजित करते हुए क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्ध छेड़नेका अनुरोध   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  3.33.64 
सत्त्वं हि मूलमर्थस्य वितथं यदतोऽन्यथा।
न तु प्रसक्तं भवति वृक्षच्छायेव हैमनी॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
आत्मबल ही धन का मूल है, जो कुछ इसके विपरीत है वह मिथ्या है; क्योंकि शीतकाल में वृक्षों की छाया के समान आत्मा की वह दुर्बलता व्यर्थ है ॥ 64॥
 
‘Self-strength is the root of wealth, whatever is contrary to this is false; because like the shade of trees during winter season, that weakness of the soul is of no avail. ॥ 64॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)