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mahabharat 3.33.21: महाराज! जो धर्म अपने को और मित्रों को दुःख देता है, वह वास्तव में दुःख है। वह धर्म नहीं, अपधर्म है॥ 21॥   |   mahabharat अध्याय 3.33: भीमसेनका पुरुषार्थकी प्रशंसा करना और युधिष्ठिरको उत्तेजित करते हुए क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्ध छेड़नेका अनुरोध   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 33: भीमसेनका पुरुषार्थकी प्रशंसा करना और युधिष्ठिरको उत्तेजित करते हुए क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्ध छेड़नेका अनुरोध  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  3.33.21 
कर्शनार्थो हि यो धर्मो मित्राणामात्मनस्तथा।
व्यसनं नाम तद् राजन्न धर्म: स कुधर्म तत्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
महाराज! जो धर्म अपने को और मित्रों को दुःख देता है, वह वास्तव में दुःख है। वह धर्म नहीं, अपधर्म है॥ 21॥
 
‘Maharaj! The religion which causes pain to oneself and friends is indeed a problem. It is not a religion, it is a bad religion.॥ 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)