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mahabharat 3.32.8: जो लोग कर्म नहीं करते, वे जीविका भी नहीं कमा सकते। इसलिए कर्म का कभी त्याग (भाग्य पर निर्भर) न करें। सदैव कर्म का ही आश्रय लें। 8.   |   mahabharat अध्याय 3.32: द्रौपदीका पुरुषार्थको प्रधान मानकर पुरुषार्थ करनेके लिये जोर देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 32: द्रौपदीका पुरुषार्थको प्रधान मानकर पुरुषार्थ करनेके लिये जोर देना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  3.32.8 
अकर्मणां वै भूतानां वृत्ति: स्यान्न हि काचन।
तदेवाभिप्रपद्येत न विहन्यात् कदाचन॥ ८॥
 
 
अनुवाद
जो लोग कर्म नहीं करते, वे जीविका भी नहीं कमा सकते। इसलिए कर्म का कभी त्याग (भाग्य पर निर्भर) न करें। सदैव कर्म का ही आश्रय लें। 8.
 
Those who do not perform any work cannot even earn a livelihood. Therefore, never abandon work (relying on destiny). Always take recourse to work. 8.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)