श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 32: द्रौपदीका पुरुषार्थको प्रधान मानकर पुरुषार्थ करनेके लिये जोर देना  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  3.32.55 
यत्र धीमानवेक्षेत श्रेयांसं बहुभिर्गुणै:।
साम्नैवार्थं ततो लिप्सेत् कर्म चास्मै प्रयोजयेत्॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
जहाँ बुद्धिमान् पुरुष शत्रु को अनेक प्रकार से श्रेष्ठ देखता है, वहाँ वह युक्तिपूर्वक ही कार्य सिद्ध करना चाहेगा और संधि आदि आवश्यक कर्तव्य करेगा ॥55॥
 
Where a wise man sees the enemy as superior in many respects, he will wish to accomplish the task only through strategic tactics and will perform the necessary duties like making a treaty etc. 55॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)