श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 32: द्रौपदीका पुरुषार्थको प्रधान मानकर पुरुषार्थ करनेके लिये जोर देना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  3.32.20 
एवं हठाच्च दैवाच्च स्वभावात् कर्मणस्तथा।
यानि प्राप्नोति पुरुषस्तत् फलं पूर्वकर्मणाम्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार मनुष्य हठ, भाग्य, स्वभाव और कर्म से जो कुछ भी प्राप्त करता है, वह सब उसके पूर्वकर्मों का ही फल है।
 
In this manner, whatever things a man obtains by obstinacy, fate, nature and actions, are all the results of his previous deeds.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)