श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 32: द्रौपदीका पुरुषार्थको प्रधान मानकर पुरुषार्थ करनेके लिये जोर देना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  3.32.19 
स्वभावत: प्रवृत्तो य: प्राप्नोत्यर्थं न कारणात्।
तत् स्वभावात्मकं विद्धि फलं पुरुषसत्तम॥ १९॥
 
 
अनुवाद
हे पुरुषोत्तम! जो पुरुष अन्य किसी कारण से नहीं, बल्कि स्वभाव से ही कर्म करके धन प्राप्त करता है, उसके धन को स्वाभाविक फल ही समझना चाहिए ॥19॥
 
Best of men! One who acquires wealth by engaging in work by nature and not due to any other reason, his wealth should be considered as the natural result. ॥19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)