vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 3: वन पर्व
»
अध्याय 32: द्रौपदीका पुरुषार्थको प्रधान मानकर पुरुषार्थ करनेके लिये जोर देना
»
श्लोक 18
श्लोक
3.32.18
यत् स्वयं कर्मणा किंचित् फलमाप्नोति पूरुष:।
प्रत्यक्षमेतल्लोकेषु तत् पौरुषमिति श्रुतम्॥ १८॥
अनुवाद
और मनुष्य जो भी कर्म करके फल पाता है, उसे पुरुषार्थ कहते हैं। यह सब लोगों को दिखाई देता है॥18॥
And whatever fruit a man gets by doing his own work is called Purusartha. This is visible to all people.॥ 18॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×