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mahabharat 3.32.18: और मनुष्य जो भी कर्म करके फल पाता है, उसे पुरुषार्थ कहते हैं। यह सब लोगों को दिखाई देता है॥18॥   |   mahabharat अध्याय 3.32: द्रौपदीका पुरुषार्थको प्रधान मानकर पुरुषार्थ करनेके लिये जोर देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 32: द्रौपदीका पुरुषार्थको प्रधान मानकर पुरुषार्थ करनेके लिये जोर देना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  3.32.18 
यत् स्वयं कर्मणा किंचित् फलमाप्नोति पूरुष:।
प्रत्यक्षमेतल्लोकेषु तत् पौरुषमिति श्रुतम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
और मनुष्य जो भी कर्म करके फल पाता है, उसे पुरुषार्थ कहते हैं। यह सब लोगों को दिखाई देता है॥18॥
 
And whatever fruit a man gets by doing his own work is called Purusartha. This is visible to all people.॥ 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)