श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 32: द्रौपदीका पुरुषार्थको प्रधान मानकर पुरुषार्थ करनेके लिये जोर देना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.32.17 
यच्चापि किंचित् पुरुषो दिष्टं नाम भजत्युत।
दैवेन विधिना पार्थ तद् दैवमिति निश्चितम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र! मनुष्य अपने भाग्य के अनुसार देवताओं की पूजा करके जो कुछ प्राप्त करता है, वह निश्चय ही भाग्य कहलाता है ॥17॥
 
O son of Kunti! Whatever a man receives by worshipping the gods according to his fate is certainly known as destiny. ॥17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)