Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.32.13: इस संसार में जो केवल भाग्य के भरोसे कर्म नहीं करता, अर्थात् जो ऐसा मानता है कि मैंने जो कुछ पहले किया है, वैसा ही फल मुझे स्वतः ही मिलेगा और जो हठ करता है - बिना किसी तर्क के, हठपूर्वक यह मानता है कि कर्म करना अनावश्यक है, जो कुछ मिलना है, वह स्वतः ही मिल जाएगा, वे दोनों ही मूर्ख हैं। जिसकी बुद्धि कर्म (पुरुषार्थ) में लगी है, वही प्रशंसा के योग्य है।॥13॥ | mahabharat अध्याय 3.32: द्रौपदीका पुरुषार्थको प्रधान मानकर पुरुषार्थ करनेके लिये जोर देना । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
इस संसार में जो केवल भाग्य के भरोसे कर्म नहीं करता, अर्थात् जो ऐसा मानता है कि मैंने जो कुछ पहले किया है, वैसा ही फल मुझे स्वतः ही मिलेगा और जो हठ करता है - बिना किसी तर्क के, हठपूर्वक यह मानता है कि कर्म करना अनावश्यक है, जो कुछ मिलना है, वह स्वतः ही मिल जाएगा, वे दोनों ही मूर्ख हैं। जिसकी बुद्धि कर्म (पुरुषार्थ) में लगी है, वही प्रशंसा के योग्य है।॥13॥
In this world, one who does not work relying only on fate, i.e. one who believes that whatever he has done earlier, he will get the same result automatically and one who is stubborn - without any logic, stubbornly believes that doing work is unnecessary, whatever has to be received, will be received automatically, both of them are fools. One whose intellect is interested in work (purusharth), he alone is worthy of praise.॥13॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥