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mahabharat 3.32.10: धन की वृद्धि और रक्षा के लिए भी कर्म आवश्यक है। यदि धन का उपभोग (खर्च) हो जाए और आय न हो, तो हिमालय जितना बड़ा धन भी नष्ट हो सकता है॥ 10॥   |   mahabharat अध्याय 3.32: द्रौपदीका पुरुषार्थको प्रधान मानकर पुरुषार्थ करनेके लिये जोर देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 32: द्रौपदीका पुरुषार्थको प्रधान मानकर पुरुषार्थ करनेके लिये जोर देना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  3.32.10 
तस्य चापि भवेत् कार्यं विवृद्धौ रक्षणे तथा।
भक्ष्यमाणो ह्यनादानात् क्षीयेत हिमवानपि॥ १०॥
 
 
अनुवाद
धन की वृद्धि और रक्षा के लिए भी कर्म आवश्यक है। यदि धन का उपभोग (खर्च) हो जाए और आय न हो, तो हिमालय जितना बड़ा धन भी नष्ट हो सकता है॥ 10॥
 
Action is also required for the growth and protection of wealth. If wealth is consumed (spent) and there is no income, then even a wealth as big as the Himalayas can be depleted.॥ 10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)