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mahabharat 3.315.24: महाराज! गाण्डीव धनुषधारी अर्जुन ने आपकी आज्ञा की प्रतीक्षा करने तथा धर्ममार्ग पर चलने की बुद्धि के कारण अब तक कोई साहसपूर्ण कार्य नहीं किया है॥ 24॥   |   mahabharat अध्याय 3.315: अज्ञातवासके लिये अनुमति लेते समय शोकाकुल हुए युधिष्ठिरको महर्षि धौम्यका समझाना, भीमसेनका उत्साह देना तथा आश्रमसे दूर जाकर पाण्डवोंका परस्पर परामर्शके लिये बैठना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 315: अज्ञातवासके लिये अनुमति लेते समय शोकाकुल हुए युधिष्ठिरको महर्षि धौम्यका समझाना, भीमसेनका उत्साह देना तथा आश्रमसे दूर जाकर पाण्डवोंका परस्पर परामर्शके लिये बैठना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  3.315.24 
अवेक्षया महाराज तव गाण्डीवधन्वना।
धर्मानुगतया बुद्धॺा न किञ्चित् साहसं कृतम्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
महाराज! गाण्डीव धनुषधारी अर्जुन ने आपकी आज्ञा की प्रतीक्षा करने तथा धर्ममार्ग पर चलने की बुद्धि के कारण अब तक कोई साहसपूर्ण कार्य नहीं किया है॥ 24॥
 
Maharaj! Arjuna, the bearer of the Gandiva bow, has not done any daring act till now because he has awaited your orders and because of his wisdom of following the path of Dharma.॥ 24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)