Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.315.22: जब महर्षि धौम्य ने धर्म-ज्ञाता युधिष्ठिर को ऐसे तर्कपूर्ण वचनों से संतुष्ट किया, तब अपने शास्त्र-ज्ञान और बुद्धि के बल के कारण वे (धर्म से) विचलित नहीं हुए। | mahabharat अध्याय 3.315: अज्ञातवासके लिये अनुमति लेते समय शोकाकुल हुए युधिष्ठिरको महर्षि धौम्यका समझाना, भीमसेनका उत्साह देना तथा आश्रमसे दूर जाकर पाण्डवोंका परस्पर परामर्शके लिये बैठना । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
तथा धौम्येन धर्मज्ञो वाक्यै: सम्परितोषित:।
शास्त्रबुद्धॺा स्वबुद्धॺा च न चचाल युधिष्ठिर:॥ २२॥
अनुवाद
जब महर्षि धौम्य ने धर्म-ज्ञाता युधिष्ठिर को ऐसे तर्कपूर्ण वचनों से संतुष्ट किया, तब अपने शास्त्र-ज्ञान और बुद्धि के बल के कारण वे (धर्म से) विचलित नहीं हुए।
When Maharishi Dhoumya satisfied the Dharma-knower Yudhishthir with such logical words, then due to his knowledge of scriptures and the power of his intellect, he did not deviate (from Dharma).
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥