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mahabharat 3.313.132: यक्ष! मेरे लिए कुंती माद्री के समान है। दोनों में कोई भेद नहीं है। मैं दोनों माताओं के प्रति समान भावना रखना चाहता हूँ। इसीलिए नकुल जीवित रहना चाहिए। 132   |   mahabharat अध्याय 3.313: यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों भाइयोंके जीवित होनेका वरदान देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  3.313.132 
यथा कुन्ती तथा माद्री विशेषो नास्ति मे तयो:।
मातृभ्यां सममिच्छामि नकुलो यक्ष जीवतु॥ १३२॥
 
 
अनुवाद
यक्ष! मेरे लिए कुंती माद्री के समान है। दोनों में कोई भेद नहीं है। मैं दोनों माताओं के प्रति समान भावना रखना चाहता हूँ। इसीलिए नकुल जीवित रहना चाहिए। 132
 
Yaksha! For me Kunti is like Madri. There is no difference between the two. I want to have equal feelings for both mothers. That is why Nakul should be alive. 132.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)