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श्लोक 3.306.12  |
कुन्त्युवाच
गम्यतां भगवंस्तत्र यत एवागतो ह्यसि।
कौतूहलात् समाहूत: प्रसीद भगवन्निति॥ १२॥ |
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| अनुवाद |
| कुंती बोलीं- हे प्रभु! आप जहाँ से आए हैं, वहीं लौट जाइए। मैंने आपको जिज्ञासावश बुलाया था। हे प्रभु! कृपया प्रसन्न होइए। |
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| Kunti said— O Lord! Please return to where you came from. I called you out of curiosity. O Lord! Please be pleased. |
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