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श्लोक 3.306.1  |
वैशम्पायन उवाच
गते तस्मिन् द्विजश्रेष्ठे कस्मिंश्चित् कारणान्तरे।
चिन्तयामास सा कन्या मन्त्रग्रामबलाबलम्॥ १॥ |
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| अनुवाद |
| वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! उस श्रेष्ठ ब्राह्मण के चले जाने पर किसी कारणवश राजकुमारी कुन्ती ने मन ही मन सोचा कि 'इन मन्त्रों में कोई शक्ति है भी या नहीं?'॥1॥ |
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| Vaishmpayana says: Janamejaya! After the departure of that great Brahmin, for some reason the princess Kunti thought to herself; 'Is there any power in this set of mantras or not?॥ 1॥ |
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