श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 306: कुन्तीके द्वारा सूर्यदेवताका आवाहन तथा कुन्ती-सूर्य-संवाद  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.306.1 
वैशम्पायन उवाच
गते तस्मिन् द्विजश्रेष्ठे कस्मिंश्चित् कारणान्तरे।
चिन्तयामास सा कन्या मन्त्रग्रामबलाबलम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! उस श्रेष्ठ ब्राह्मण के चले जाने पर किसी कारणवश राजकुमारी कुन्ती ने मन ही मन सोचा कि 'इन मन्त्रों में कोई शक्ति है भी या नहीं?'॥1॥
 
Vaishmpayana says: Janamejaya! After the departure of that great Brahmin, for some reason the princess Kunti thought to herself; 'Is there any power in this set of mantras or not?॥ 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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