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mahabharat 3.302.10: हे देवश्रेष्ठ! आप मुझे अपना भिक्षा-व्रत पूर्ण करने की अनुमति दीजिए, जिससे मैं भिक्षापात्र के रूप में आए हुए इन्द्र को प्राणदान दे सकूँ ॥10॥   |   mahabharat अध्याय 3.302: सूर्य-कर्ण-संवाद, सूर्यकी आज्ञाके अनुसार कर्णका इन्द्रसे शक्ति लेकर ही उन्हें कुण्डल और कवच देनेका निश्चय   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  3.302.10 
इदं त्वमनुजानीहि सुरश्रेष्ठ व्रतं मम।
भिक्षते वज्रिणे दद्यामपि जीवितमात्मन:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
हे देवश्रेष्ठ! आप मुझे अपना भिक्षा-व्रत पूर्ण करने की अनुमति दीजिए, जिससे मैं भिक्षापात्र के रूप में आए हुए इन्द्र को प्राणदान दे सकूँ ॥10॥
 
O best of the gods! Please give me your permission to fulfil my vow of giving alms so that I can give my life to Indra who has come as a beggar. ॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)