श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 300: सूर्यका स्वप्नमें कर्णको दर्शन देकर उसे इन्द्रको कुण्डल और कवच न देनेके लिये सचेत करना तथा कर्णका आग्रहपूर्वक कुण्डल और कवच देनेका ही निश्चय रखना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  3.300.8 
स्वप्नान्ते निशि राजेन्द्र दर्शयामास रश्मिवान्।
कृपया परयाऽऽविष्ट: पुत्रस्नेहाच्च भारत॥ ८॥
 
 
अनुवाद
राजेन्द्र! भरतनन्दन! अंशुमाली! पुत्र-प्रेम से महान करुणा से युक्त भगवान सूर्य ने रात्रि में कर्ण को स्वप्न में दर्शन दिए॥8॥
 
Rajendra! Bharatnandan! Anshumali Lord Surya, filled with great compassion out of love for his son, appeared to Karna in his dreams at night. 8॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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