|
| |
| |
श्लोक 3.300.39  |
सोऽहं दत्त्वा मघवते भिक्षामेतामनुत्तमाम्।
ब्राह्मणच्छद्मिने देव लोके गन्ता परां गतिम्॥ ३९॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| इसलिए देव! इस प्रकार के व्रत का पालन करके मैं ब्राह्मण रूप धारण करके इन्द्र को यह उत्तम भिक्षा देकर संसार में उत्तम गति को प्राप्त करूँगा॥39॥ |
| |
| That's why Dev! By observing this type of fast, I will attain the best path in the world by giving this supreme alms to Indra in the form of a Brahmin. 39॥ |
| |
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कुण्डलाहरणपर्वणि सूर्यकर्णसंवादे त्रिशततमोऽध्याय:॥ ३००॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कुण्डलाहरणपर्वमें सूर्यकर्णसंवादविषयक तीन सौवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३००॥
|
| |
| ✨ ai-generated |
| |
|