श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 300: सूर्यका स्वप्नमें कर्णको दर्शन देकर उसे इन्द्रको कुण्डल और कवच न देनेके लिये सचेत करना तथा कर्णका आग्रहपूर्वक कुण्डल और कवच देनेका ही निश्चय रखना  »  श्लोक 37-38
 
 
श्लोक  3.300.37-38 
भीतानामभयं दत्त्वा संग्रामे जीवितार्थिनाम्।
वृद्धान् बालान् द्विजातींश्च मोक्षयित्वा महाभयात्॥ ३७॥
प्राप्स्यामि परमं लोके यश: स्वर्ग्यमनुत्तमम्।
जीवितेनापि मे रक्ष्या कीर्तिस्तद् विद्धि मे व्रतम्॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
युद्ध में भयभीत होकर प्राणों की भीख माँगने वाले सैनिकों को सुरक्षा प्रदान करके तथा बालकों, वृद्धों और ब्राह्मणों को महान भय से मुक्त करके मैं संसार में सर्वोच्च स्वर्गीय यश अर्जित करूँगा। मुझे प्राणों का बलिदान देकर भी अपने यश की रक्षा करनी है। इसे तुम मेरा व्रत समझो। ॥37-38॥
 
By giving protection to the soldiers who are begging for their lives in the war out of fear and by freeing children, old people and Brahmins from great fear, I will earn the highest heavenly fame in the world. I have to protect my fame even by sacrificing my life. Consider this as my vow. ॥37-38॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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