श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 300: सूर्यका स्वप्नमें कर्णको दर्शन देकर उसे इन्द्रको कुण्डल और कवच न देनेके लिये सचेत करना तथा कर्णका आग्रहपूर्वक कुण्डल और कवच देनेका ही निश्चय रखना  »  श्लोक 35-36
 
 
श्लोक  3.300.35-36 
सोऽहं शरीरजे दत्त्वा कीर्तिं प्राप्स्यामि शाश्वतीम्।
दत्त्वा च विधिवद् दानं ब्राह्मणेभ्यो यथाविधि॥ ३५॥
हुत्वा शरीरं संग्रामे कृत्वा कर्म सुदुष्करम्।
विजित्य च परानाजौ यश: प्राप्स्यामि केवलम्॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
अतः मैं अपने शरीर से उत्पन्न कवच और कुण्डल इन्द्र को देकर अनन्त यश प्राप्त करूँगा। ब्राह्मणों को विधिपूर्वक दान देकर, अत्यन्त कठिन पराक्रम करके, युद्धाग्नि में अपने शरीर की आहुति देकर तथा युद्ध में शत्रुओं को परास्त करके केवल सुयशक प्राप्त करूँगा। 35-36॥
 
Therefore, I will attain eternal fame by giving the armor and earrings born with my body to Indra. I will earn only Suyashka by giving donations to the brahmins in the prescribed manner, by performing extremely difficult feats, by sacrificing my body in the battle fire and by defeating the enemies in the battle. 35-36॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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