श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 300: सूर्यका स्वप्नमें कर्णको दर्शन देकर उसे इन्द्रको कुण्डल और कवच न देनेके लिये सचेत करना तथा कर्णका आग्रहपूर्वक कुण्डल और कवच देनेका ही निश्चय रखना  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  3.300.34 
पुरुषस्य परे लोके कीर्तिरेव परायणम्।
इह लोके विशुद्धा च कीर्तिरायुर्विवर्द्धनी॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
परलोक में मनुष्य के लिए यश ही सबसे बड़ा आश्रय है। इस लोक में भी शुद्ध यश आयु को बढ़ाता है। 34॥
 
Fame is the greatest refuge for a man in the next world. Even in this world, pure fame increases life. 34॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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