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श्लोक 3.300.32  |
कीर्तिर्हि पुरुषं लोके संजीवयति मातृवत्।
अकीर्तिर्जीवितं हन्ति जीवतोऽपि शरीरिण:॥ ३२॥ |
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| अनुवाद |
| इस संसार में यश माता के समान मनुष्य को नवजीवन प्रदान करता है, किन्तु अपयश जीवित प्राणी का भी जीवन नष्ट कर देता है ॥32॥ |
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| Like a mother, fame gives new life to man in this world. But infamy destroys the life of even a living person. 32॥ |
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