श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 300: सूर्यका स्वप्नमें कर्णको दर्शन देकर उसे इन्द्रको कुण्डल और कवच न देनेके लिये सचेत करना तथा कर्णका आग्रहपूर्वक कुण्डल और कवच देनेका ही निश्चय रखना  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  3.300.29 
सोऽहमिन्द्राय दास्यामि कुण्डले सह वर्मणा।
यदि मां बलवृत्रघ्नो भिक्षार्थमुपयास्यति॥ २९॥
 
 
अनुवाद
ऐसी स्थिति में यदि बलासुर और वृत्रासुर का संहार करने वाले भगवान इंद्र मुझसे भिक्षा मांगने आएं तो मैं उन्हें कवच और दोनों कुण्डल अवश्य दे दूंगा।
 
In such a situation, if Lord Indra, the destroyer of Balasur and Vritrasur, comes to me for alms, then I will certainly give him the armour and both the earrings.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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