श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 300: सूर्यका स्वप्नमें कर्णको दर्शन देकर उसे इन्द्रको कुण्डल और कवच न देनेके लिये सचेत करना तथा कर्णका आग्रहपूर्वक कुण्डल और कवच देनेका ही निश्चय रखना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  3.300.28 
मद्विधस्य यशस्यं हि न युक्तं प्राणरक्षणम्।
युक्तं हि यशसा युक्तं मरणं लोकसम्मतम्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
मेरे जैसे वीर पुरुष को प्राण देकर भी अपने यश की रक्षा करनी चाहिए; अपयश लेकर प्राण बचाना कभी उचित नहीं है। यदि कोई सुयश के साथ मरता है, तो वह वीर होता है और सम्पूर्ण जगत के लिए आदर का पात्र होता है ॥28॥
 
A brave man like me must protect his fame even at the cost of his life; It is never right to save lives by taking slander. If one dies along with Suyash, he is a hero and an object of respect for the entire world. 28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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