श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 300: सूर्यका स्वप्नमें कर्णको दर्शन देकर उसे इन्द्रको कुण्डल और कवच न देनेके लिये सचेत करना तथा कर्णका आग्रहपूर्वक कुण्डल और कवच देनेका ही निश्चय रखना  »  श्लोक 26-27
 
 
श्लोक  3.300.26-27 
यद्यागच्छति मां शक्रो ब्राह्मणच्छद्मना वृत:।
हितार्थं पाण्डुपुत्राणां खेचरोत्तम भिक्षितुम्॥ २६॥
दास्यामि विबुधश्रेष्ठ कुण्डले वर्म चोत्तमम्।
न मे कीर्ति: प्रणश्येत त्रिषु लोकेषु विश्रुता॥ २७॥
 
 
अनुवाद
आकाश में विचरण करने वालों में श्रेष्ठ सूर्यदेव! यदि पाण्डवों के कल्याण के लिए स्वयं भगवान इन्द्र ब्राह्मण का वेश धारण करके मेरे पास भिक्षा मांगने आ रहे हैं, तो हे भगवन्! मैं उन्हें वे दोनों कुण्डल और उत्तम कवच अवश्य दूँगा, जिससे तीनों लोकों में विख्यात मेरा यश नष्ट न हो॥26-27॥
 
The best sun god among those who roam in the sky! If Lord Indra himself is coming to me begging for alms after disguising himself as a Brahmin for the welfare of the Pandavas, then God! I will definitely give them both the earrings and the best armor, so that my fame, which has become famous in all the three worlds, does not get destroyed. 26-27॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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