श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 300: सूर्यका स्वप्नमें कर्णको दर्शन देकर उसे इन्द्रको कुण्डल और कवच न देनेके लिये सचेत करना तथा कर्णका आग्रहपूर्वक कुण्डल और कवच देनेका ही निश्चय रखना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  3.300.23 
कर्ण उवाच
श्रेय एव ममात्यन्तं यस्य मे गोपति: प्रभु:।
प्रवक्ताद्य हितान्वेषी शृणु चेदं वचो मम॥ २३॥
 
 
अनुवाद
कर्ण ने कहा- जिस कर्ण का कल्याण स्वयं भगवान सूर्य ने पूछा है और जिसके कल्याण का वर्णन स्वयं भगवान सूर्य ने किया है, वह कर्ण निश्चित ही परम कल्याण को प्राप्त होता है। हे प्रभु! कृपया मेरी बात सुनिए॥23॥
 
Karna said- Karna, whose welfare is investigated by Lord Surya himself and whose welfare is told by him, that Karna is sure to attain supreme welfare. O Lord! Please listen to me.॥ 23॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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