श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 300: सूर्यका स्वप्नमें कर्णको दर्शन देकर उसे इन्द्रको कुण्डल और कवच न देनेके लिये सचेत करना तथा कर्णका आग्रहपूर्वक कुण्डल और कवच देनेका ही निश्चय रखना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  3.300.21 
कर्ण उवाच
को मामेवं भवान् प्राह दर्शयन् सौहृदं परम्।
कामया भगवन् ब्रूहि को भवान् द्विजवेषधृक्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
कर्ण ने पूछा - हे प्रभु! चूँकि आप मुझ पर इतना स्नेह रखते हैं और मुझे इतना लाभदायक उपदेश दे रहे हैं, अतः मैं जानना चाहता हूँ कि आप कौन हैं? यदि आपकी इच्छा हो, तो कृपया मुझे बताएँ। आप कौन हैं, जो ब्राह्मण का वेश धारण किए हुए हैं?॥ 21॥
 
Karna asked - O Lord! Since you are showing great affection towards me and giving me such beneficial advice, I want to know who you are. If you wish, please tell me. Who are you who is wearing the guise of a Brahmin?॥ 21॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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