श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 300: सूर्यका स्वप्नमें कर्णको दर्शन देकर उसे इन्द्रको कुण्डल और कवच न देनेके लिये सचेत करना तथा कर्णका आग्रहपूर्वक कुण्डल और कवच देनेका ही निश्चय रखना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  3.300.19 
कवचेन समायुक्त: कुण्डलाभ्यां च मानद।
अवध्यस्त्वं रणेऽरीणामिति विद्धि वचो मम॥ १९॥
 
 
अनुवाद
हे माननीय! कवच और कुण्डलों से सुसज्जित होकर आप युद्धस्थल में शत्रुओं के लिए भी अजेय रहेंगे, यह बात मुझसे समझ लीजिए॥19॥
 
O Honorable! When you are equipped with your armor and earrings, you will remain invincible even for the enemies in the battle field, understand this from me.॥ 19॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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