श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 300: सूर्यका स्वप्नमें कर्णको दर्शन देकर उसे इन्द्रको कुण्डल और कवच न देनेके लिये सचेत करना तथा कर्णका आग्रहपूर्वक कुण्डल और कवच देनेका ही निश्चय रखना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.300.16 
कुण्डलार्थे ब्रुवंस्तात कारणैर्बहुभिस्त्वया।
अन्यैर्बहुविधैर्वित्तै: सन्निवार्य: पुन: पुन:॥ १६॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार जब भी वह कुण्डल माँगे, तब तुम उसे अनेक कारण बताकर तथा अनेक प्रकार के धन आदि देकर बार-बार मना करना॥16॥
 
In this manner, whenever he asks for the earrings, you should repeatedly refuse him by giving many reasons and by saying that you will give him various kinds of money etc.॥ 16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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