श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 300: सूर्यका स्वप्नमें कर्णको दर्शन देकर उसे इन्द्रको कुण्डल और कवच न देनेके लिये सचेत करना तथा कर्णका आग्रहपूर्वक कुण्डल और कवच देनेका ही निश्चय रखना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.300.15 
तस्मै प्रयाचमानाय न देये कुण्डले त्वया।
अनुनेय: परं शक्त्या श्रेय एतद्धि ते परम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
यदि वह उन्हें मांगे, तो उसे अपने कुण्डल मत देना। यथाशक्ति उसे समझाना; इससे तुम्हारा बड़ा कल्याण होगा॥15॥
 
‘If he asks for them, do not give him your earrings. Persuade him to the best of your ability; this will bring you great good.॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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