श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 300: सूर्यका स्वप्नमें कर्णको दर्शन देकर उसे इन्द्रको कुण्डल और कवच न देनेके लिये सचेत करना तथा कर्णका आग्रहपूर्वक कुण्डल और कवच देनेका ही निश्चय रखना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.300.14 
त्वां तु चैवंविधं ज्ञात्वा स्वयं वै पाकशासन:।
आगन्ता कुण्डलार्थाय कवचं चैव भिक्षितुम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार तुम्हारा स्वभाव जानकर इन्द्र तुमसे तुम्हारे कवच और कुण्डल मांगने के लिए आने वाले हैं ॥14॥
 
Knowing your nature like this, Indra is going to come from you to ask for your armor and earrings. 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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