श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 300: सूर्यका स्वप्नमें कर्णको दर्शन देकर उसे इन्द्रको कुण्डल और कवच न देनेके लिये सचेत करना तथा कर्णका आग्रहपूर्वक कुण्डल और कवच देनेका ही निश्चय रखना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  3.300.13 
त्वं हि तात ददास्येव ब्राह्मणेभ्य: प्रयाचितम्।
वित्तं यच्चान्यदप्याहुर्न प्रत्याख्यासि कस्यचित्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
पिताश्री! आप ब्राह्मणों को जो कुछ भी मांगते हैं, वह सब देते हैं; धन आदि जो कुछ भी वे मांगते हैं, वह सब आप देते हैं। आप कभी किसी को 'नहीं' कहकर निराश नहीं लौटाते॥13॥
 
‘Father! You always give the brahmins whatever they ask for; along with money and whatever else they ask for, you also give them everything. You never send anyone back disappointed by saying ‘no’.॥ 13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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