श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 300: सूर्यका स्वप्नमें कर्णको दर्शन देकर उसे इन्द्रको कुण्डल और कवच न देनेके लिये सचेत करना तथा कर्णका आग्रहपूर्वक कुण्डल और कवच देनेका ही निश्चय रखना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  3.300.11 
उपायास्यति शक्रस्त्वां पाण्डवानां हितेप्सया।
ब्राह्मणच्छद्मना कर्ण कुण्डलापजिहीर्षया॥ ११॥
 
 
अनुवाद
कान! देवराज इन्द्र पाण्डवों का कल्याण चाहते हुए ब्राह्मण वेश धारण करके तुम्हारे दोनों कुण्डल (तथा कवच) लेने के लिए तुम्हारे पास आएंगे॥11॥
 
Ear! Devraj Indra, wishing for the welfare of the Pandavas, will come to you in the disguise of a Brahmin to take both your earrings (and armour). 11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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