श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 300: सूर्यका स्वप्नमें कर्णको दर्शन देकर उसे इन्द्रको कुण्डल और कवच न देनेके लिये सचेत करना तथा कर्णका आग्रहपूर्वक कुण्डल और कवच देनेका ही निश्चय रखना  »  श्लोक 1-3
 
 
श्लोक  3.300.1-3 
जनमेजय उवाच
यत् तत् तदा महद् ब्रह्मँल्लोमशो वाक्यमब्रवीत्।
इन्द्रस्य वचनादेव पाण्डुपुत्रं युधिष्ठिरम्॥ १॥
यच्चापि ते भयं तीव्रं न च कीर्तयसे क्वचित्।
तच्चाप्यपहरिष्यामि धनंजय इतो गते॥ २॥
किं नु तज्जपतां श्रेष्ठ कर्णं प्रति महद् भयम्।
आसीन्न च स धर्मात्मा कथयामास कस्यचित्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय ने पूछा - हे ब्रह्मन्! इन्द्र के कहने से लोमश ने पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर से यह महत्त्वपूर्ण बात कही थी कि 'तुम्हें जो महान भय है और जिसकी चर्चा भी तुम किसी से नहीं करते, अर्जुन के इस स्थान (स्वर्ग) से चले जाने पर मैं उसे भी दूर कर दूँगा।' हे जप करने वालों में श्रेष्ठ वैशम्पायन! धर्मात्मा महाराज युधिष्ठिर को कर्ण से कौन-सा महान भय था, जिसकी चर्चा भी उन्होंने किसी से नहीं की?॥1-3॥
 
Janamejaya asked - O Brahman! As per Indra's instructions, Lomasha had said this important thing to Yudhishthira, son of Pandu, that 'The great fear that you have and which you do not even discuss with anybody, I will remove that too after Arjuna leaves this place (heaven).' O Vaishampayana, the best of those who chant, what was that great fear that the righteous Maharaja Yudhishthira had from Karna, which he did not even discuss with anybody?॥ 1-3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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