श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 297: सावित्री और यमका संवाद, यमराजका संतुष्ट होकर सावित्रीको अनेक वरदान देते हुए मरे हुए सत्यवान‍्को भी जीवित कर देना तथा सत्यवान‍् और सावित्रीका वार्तालाप एवं आश्रमकी ओर प्रस्थान  »  श्लोक 84
 
 
श्लोक  3.297.84 
दिवापि मयि निष्क्रान्ते संतप्येते गुरू मम।
विचिनोति हि मां तात: सहैवाश्रमवासिभि:॥ ८४॥
 
 
अनुवाद
यदि मैं दिन में आश्रम से बाहर भी चला जाता हूं तो मेरे माता-पिता चिंतित हो जाते हैं और मेरे पिता आश्रमवासियों के साथ मेरी तलाश में निकल पड़ते हैं।
 
Even if I go away from the Ashram during the day, my parents become anxious and my father sets out to look for me along with the Ashram residents.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)