श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 297: सावित्री और यमका संवाद, यमराजका संतुष्ट होकर सावित्रीको अनेक वरदान देते हुए मरे हुए सत्यवान‍्को भी जीवित कर देना तथा सत्यवान‍् और सावित्रीका वार्तालाप एवं आश्रमकी ओर प्रस्थान  »  श्लोक 83
 
 
श्लोक  3.297.83 
न कदाचिद् विकालं हि गतपूर्वो मयाऽऽश्रम:।
अनागतायां सन्ध्यायां माता मे प्ररुणद्धि माम्॥ ८३॥
 
 
अनुवाद
इससे पहले मैं कभी भी इतनी देर से और इतनी असमय आश्रम नहीं लौटा। माँ मुझे शाम होने से पहले ही रोक लेती हैं - वे मुझे आश्रम से बाहर नहीं जाने देतीं। 83.
 
Never before have I returned to my ashram so late and untimely. Mother stops me before the evening comes - she does not let me go out of the ashram. 83.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)