श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 297: सावित्री और यमका संवाद, यमराजका संतुष्ट होकर सावित्रीको अनेक वरदान देते हुए मरे हुए सत्यवान‍्को भी जीवित कर देना तथा सत्यवान‍् और सावित्रीका वार्तालाप एवं आश्रमकी ओर प्रस्थान  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  3.297.47 
सावित्र्युवाच
सतां सदा शाश्वतधर्मवृत्ति:
सन्तो न सीदन्ति न च व्यथन्ति।
सतां सद्भिर्नाफल: सङ्गमोऽस्ति
सद्भॺो भयं नानुवर्तन्ति सन्त:॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
सावित्री बोली - सज्जनों का मन सदैव धर्म में लगा रहता है । सज्जन कभी दुःखी या व्यथित नहीं होते । सज्जनों का संतों के साथ किया गया समागम कभी निष्फल नहीं होता । सज्जन कभी संतों से नहीं डरते ॥47॥
 
Savitri said - The mind of the good men is always engaged in religion. The good men are never sad or distressed. The association of good men with saints is never fruitless. The good men are never afraid of the saints.॥ 47॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)