श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 297: सावित्री और यमका संवाद, यमराजका संतुष्ट होकर सावित्रीको अनेक वरदान देते हुए मरे हुए सत्यवान‍्को भी जीवित कर देना तथा सत्यवान‍् और सावित्रीका वार्तालाप एवं आश्रमकी ओर प्रस्थान  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  3.297.41 
विवस्वतस्त्वं तनय: प्रतापवां-
स्ततो हि वैवस्वत उच्यसे बुधै:।
समेन धर्मेण चरन्ति ता: प्रजा-
स्ततस्तवेहेश्वर धर्मराजता॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
देवेश्वर! आप विवस्वान (सूर्य) के तेजस्वी पुत्र हैं; इसलिए विद्वान पुरुष आपको वैवस्वत कहते हैं। आप धर्मानुसार समस्त प्रजा के साथ समान व्यवहार करते हैं; इसलिए आप धर्मराज कहलाते हैं॥ 41॥
 
Deveshwara! You are the glorious son of Vivasvan (Sun); therefore learned men call you Vaivasvat. You behave equally with all the subjects according to the Dharma; therefore you are called Dharmaraja.॥ 41॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)