श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 297: सावित्री और यमका संवाद, यमराजका संतुष्ट होकर सावित्रीको अनेक वरदान देते हुए मरे हुए सत्यवान‍्को भी जीवित कर देना तथा सत्यवान‍् और सावित्रीका वार्तालाप एवं आश्रमकी ओर प्रस्थान  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  3.297.40 
सावित्र्युवाच
न दूरमेतन्मम भर्तृसंनिधौ
मनो हि मे दूरतरं प्रधावति।
अथ व्रजन्नेव गिरं समुद्यतां
मयोच्यमानां शृणु भूय एव च॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
सावित्री बोली - हे प्रभु! मैं अपने स्वामी के निकट हूँ। अतः यह स्थान मेरे लिए दूर नहीं है। मेरा मन तो और भी दूर भागता है। चलते समय आप मेरे ये वचन पुनः सुनें॥40॥
 
Savitri said - O Lord! I am near my master. Therefore this place is not far for me. My mind runs even farther. While walking you may listen to these words of mine again.॥ 40॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)