श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 297: सावित्री और यमका संवाद, यमराजका संतुष्ट होकर सावित्रीको अनेक वरदान देते हुए मरे हुए सत्यवान‍्को भी जीवित कर देना तथा सत्यवान‍् और सावित्रीका वार्तालाप एवं आश्रमकी ओर प्रस्थान  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  3.297.37 
यम उवाच
पिपासितस्येव भवेद् यथा पय-
स्तथा त्वया वाक्यमिदं समीरितम्।
विना पुन: सत्यवतोऽस्य जीवितं
वरं वृणीष्वेह शुभे यदिच्छसि॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
यमराज बोले - शुभ! जैसे प्यासे को जल सुखदायक होता है, वैसे ही तुम्हारी कही बात मुझे परम सुख दे रही है। अतः सत्यवान के जीवन के अतिरिक्त जो भी वर चाहो, मांग लो।
 
Yamraj said - Shubh! Just as water is pleasurable to a thirsty person, similarly what you have said is giving me immense pleasure. Therefore, ask for any boon you want, other than Satyavan's life.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)